4 Best Unemployment pain poem | बेरोजगार का दर्द कविता

बेरोजगारी का आलम यह है दोस्तों की आजकल बेरोजगार का कोई दर्द समझता नहीं दोस्तों हमने 4 बेरोजगारी पर दर्द की कविताएं दी है जिसे आप पढ़े हैं और अनुभव करें और अपने दोस्तों को तो जरूर पढ़ाएं

बेरोजगार व्यक्ति को अपने ही समाज अपने ही रिश्तेदार परिवार और दोस्तों का नजरिया बदल जाता है वह बेरोजगार व्यक्ति को इस नजरिए से देखते हैं कि कहीं वह हमसे पैसा ना मांगे .

Unemployment Pain Poem

डिग्रियां टंगी दीवार सहारे,
मेरिट का ऐतबार नहीं है,
सजी अर्थी नौकरियों की देश में अब रोज़गार नहीं?
शमशान हुए बाज़ार यहां सब,
चौपट कारोबार यहां सब,
डॉलर पहुंचा आसमान पर,
रुपया हुआ लाचार यहां सब,
ग्राहक बिन व्यापार नहीं है,
देश में अब रोज़गार नहीं है।
चाय से चीनी रूठ गई है,
दाल से रोटी छूट गई है,
साहब खाएं मशरूम की सब्जी,
कमर किसान की टूट गई है,
खड़ी फसल ख़रीदार नहीं है।
देश में अब रोज़गार नहीं है।
दाम सिलेंडर के दूने हो गए,
कल के हीरो नमूने हो गए,
मेकअप-वेकअप हो गया महंगा,
चाँद से मुखड़े सूने हो गए,
नारी है पर श्रृंगार नही है,
देश मे अब रोज़गार नही है।
साधु-संत व्यापारी हो गए,
व्यापारी घंटा-धारी हो गए,
कैद में आंदोलनकारी हो गए,
सरकार से कोई सरोकार नही है,
युवा मगर लाचार नही है
देश मे अब रोज़गार नही है।
देश मे अब रोज़गार नही है।
*एक बेरोजगार का दर्द,प्रस्तुत करता

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बेरोजगार का दर्द कविता

विधा – कविता
शीर्षक – मजदूर
किसे दर्द सुनाऊँ
में किसे कहूँ
मैं मजदूर हूं साहब, मैं मजदूर हूं साहब।
जिस घर में तुम रहते हो,
जो रोड़ मैने बनाई है,
उस पर ही लाश मेरी,
आज पड़ी नजर मुझे आई है।
ना झूठी अभिलाषा, ना दिखाता झूठे ख्वाब,
मैं मजदूर हूं साहब। मैं मजदूर हूं साहब।
भूखा प्यासा, परिवार मेरा,
शहर छोड़ कर निकला है,
ना काम है, ना खाने को,
दुख में बहती, लहर छोड़कर निकला है,
मकानों के मालिकों ने,
डाला मुझ पर, किराया का दबाव।
मैं मजदूर हूं साहब, मैं मजदूर हूं साहब।
इस लाकडाउन ने, मुझे घटनाओं से घेर लिया।
कहीं, मुजफ्फरनगर, कहीं, औरैया,
कहीं नेताओं ने मुहं फेर लिया।
रोते-रोते कहता हूं सुनलो कुर्सी के नवाब,
मैं मजदूर हूं साहब, मैं मजदूर हूं साहब।
बहुत देर में करा आपने 20 लाख करोड़ के,
राहत पैकेज का ऐलान,
मेरे बच्चे सम्भाल लेना,
मेरी तो चली गई है जान।
Online टिकट बुकिंग करनी,
आती तो, ना जाती मेरी जान,
बस आज में नि शब्द: हूं जनाब,
बस आज में नि शब्द: हूं जनाब।
मैं मजदूर हूं साहब, मैं मजदूर हूं साहब।
किसे दर्द सुनाऊँ,
में किसे कहूँ,
मैं मजदूर हूं साहब, मैं मजदूर हूं साहब।

 

Unemployment Pain Poem

मेरी पंक्तियां न हंसी है
न ही रोमांच है,
न ही मजाक है
न ही किसी का विरोध है ,
मेरी पंक्तियां साहित्य भी नहीं है, माफ कीजिए
मैं बेरोजगार की आवाज हूँ,
भूख से मरते व्यक्ति का स्वर हूँ
मेरी पंक्तियां गुलाम नहीं है सरकारों की
यह तो आवाज है
भूखी बेरोजगार जनता की
मेरी पंक्तियां
झोपड़ी के दर्द की आवाज है
सरकारों को आईना है,
भुखमरी की बयान है।
सरकारों को देख कर
क्रोध वाले आँसू पी रहा हूँ मैं।
मेरे होश उड़ गए हैं
बढ़ती मंहगाई देख कर
आत्माहत्या की चिता पर
किसानों को देखकर
कुछ तो सोचना चाहिए
इस देश के प्रधान को
सोचकर यह सब मै डरने लगा हूँ
बताकर भुखमरी की बातें
अपना काव्य-धर्म निभा रहा हूं
बता रहा हूँ इसलिए कि
परिवर्तन ला सकूं
झोपड़ी में भी एक दिया
मैं जला सकूं।
आज आपको भुख की कथा मै सुनाऊंगा
मैंने शाबाशी के लिए कभी कविता नहीं लिखी
आप सोचते होंगे यह विषय ही बकवास है,
आप ऐसा सोचते हैं तो भी बेकसूर हैं
क्योंकि आप इस भुखमरी से अभी दूर है
आपने देखी नहीं है भुखमरी की तड़प
मैंने ऐसे परिवार देखें हैं जहां चाय बागान बन्द होने पर जिसने पानी पी कर पानी निकाली है।
गरीबी की कोई सीमा ही नहीं
लाखों परिवार को दो वक्त की रोटी मिलती ही नहीं
बीमार बच्चा सो रहा है बोरी ओढ़कर
मां कमा रही है चाय पत्ती तोड़ कर
और २०२ में परिवार पाल रहे हैं आँसू पी कर
और अपना प्राण दे रहे हैं भुखमरी के भेद पर।
बेटीयाँ, जो इज्जत होती है घर परिवार की
आज भुख के कारण समान हो गया है दुकान की
भूख आदमी का स्वाभिमान तोड़ देता है
भूख के लिए कितनों ने अपना घर छोड़ा है
भूख तो हूज़ूर पुरी खुशियां छीन लेती है
मां बहनों की मांग का सिन्दूर छीन लेती है
सिर्फ १००० रूपए में बहन बेटियों को बेच देती हैं
भूख सभी सीमा रेखा तोड़ देती है।
पूजा-पाठ और प्रार्थना होती है अभिनेताओं के लिए
कोई पुजा-पाठ नहीं होता भुखे पेट के लिए
कोई चमत्कार से राख बना लेता है
कोई बूटीयाँ दे रहे हैं बच्चा पैदा होने की
कोई हवा में बना रहे हैं अंगुठियां
पर रोटी न दे पाया कोई फकिर या बाबा।
भूख का निदान नेताओं के भाषण में नहीं
भूख का निदान जादू टोना में भी नहीं
गरीबी हटाओ के नारों में भी नहीं
भूख से कोई मरे यह हत्या के समान है
हत्या के लिए मृत्यु दण्ड होना चाहिए
कानून में सुधार होना चाहिएu
भूख से मौत पर सरकार और प्रशासन को
जिम्मेदार होना चाहिए।

 

बेरोजगार का दर्द कविता

बेरोजगार युवक का दर्द भरी कविता”
मोर ले ज्यादा तो मोर घरवाला मन ल भारी टेंशन होगे हे !!
काबर की मोर रिश्ता आज फिर कैन्सल होगे हे !!
कोंनजनी ये दुनिया म मनखे मन ल काय होगे हे !!
रिश्ता जमींदार अउ नौकरी वाला मनके होगे हे !!
टुरी देखे जाबे त अजब गजब उकर सवाल होगे हे !!
कतका खेतीखार, कतका कमाथा पहिली सवाल होगे हे !!
कतका पढ़े हस, नौकरी करतस पहेली के सवाल होगे हे !!
दारू पीथस, गुटखा खाथस टुरी के अलग सवाल होगे हे !!
सबो जन के सवाल जवाब म जी के जंजाल होगे हे !!
पारा परोस के ताना देवई म दाई के हलकान होगे हे !!
बनत बनत बनगे नई तो भारी टेंसन होगे हे !!
टुरा टुरी के घर वाला ल पसन्द नई आइस त फिर रिश्ता केंसल होगे हे !!
मोर ले ज्यादा तो मोर दाई व घर वाले मन ल भारी टेंसन होगे हे !!
काबर की फिर मोर आज रिश्ता केंसल होगे हे !!

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