Krishna Janmashtami Puja Method and Mantra 2022

इस विधि से करें जन्माष्टमी पर श्री कृष्ण भगवान की पूजा यदि आप श्री कृष्ण भगवान की पूजा विधि विधान से करना चाहते हैं तो सही जगह पर आए हैं

दोस्तों पूजा करने के समय पर हर पदार्थ को चढ़ाने में अलग-अलग मंत्र होता है हमारे पास है श्री कृष्ण की पूजा कैसे करें और उसके मंत्र

Krishna Janmashtami step by step Puja Method and Mantra

ध्यानम् – अपने भीतर की आत्मा को उसके साथ जोड़ने के लिए भगवान कृष्ण का ध्यान और नामजप करें।
आसन – कृष्ण की मूर्ति को झूले पर रखें। यदि आपके पास झूला/पालना नहीं है, तो आप मूर्ति को रंगोली से सजाए गए
लकड़ी के मंच पर रख सकते हैं।
पद्य – मूर्ति के चरणों में जल अर्पित करें।
अर्घ्य – मूर्ति को जल अर्पित करें।
आचमन- इसके बाद अपनी हथेली से पानी पिएं।
स्नान – मूर्ति को स्नान कराएं।
वस्त्र – कृष्ण को कोई नया वस्त्र या वस्त्र भेंट करें। भगवान कृष्ण को नया वस्त्र पहनाएं
यज्ञोपवीत – जनेऊ अर्पित करें। इसे तिरछे दाएं हाथ के नीचे और बाएं कंधे के ऊपर रखें।
गंधा – चंदन का पेस्ट चढ़ाएं
आभरणं हस्तभूषण – बांसुरी, मोर मुकुट और आभूषण चढ़ाएं।
पुष्पा – तुलसी के पत्ते और फूल चढ़ाएं।
धूप – धूप और अगरबत्ती अर्पित करें
दीप – तेल का दीपक अर्पित करें
नैवेद्य – भगवान को भोग लगाएं और माखन
तंबुलम – एक थाली पेश करें जिसमें पान और सुपारी, एक पूरा नारियल, फल, कुमकुम और हल्दी शामिल हों
दक्षिणा – सिक्के या करेंसी नोट अर्पित करें
आरती – “कुंज बिहारी” आरती गाएं
परिक्रमा या प्रदक्षिणा – खड़े हो जाओ और अपने दाहिनी ओर मुड़ो।
पुष्पांजलि – पुष्प अर्पित करते हुए प्रणाम करें।
नमस्कार – भगवान के सामने झुकना
क्षमा यज्ञ – पूजा करें और अपने द्वारा की गई सभी गलतियों के लिए क्षमा मांगें

कृष्ण जन्माष्टमी सिर्फ भारत मे ही नहीं बल्कि भारत के बाहर रहने वाले हिन्दू भी अपनी जगहो पर इस उत्सव को अपने हिसाब से मनाते है तथा श्री कृष्ण की आराधना करते है . जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जन्म दिवस के रूप मे पूरे भारत मे बहुत ही उत्साह के साथ मनाई जाती है.

श्री कृष्ण जी को भगवान विष्णु का अवतार भी माने जाते है. भारत विभिनता मे समानता का देश है, इसी का उदहारण है कि जन्माष्टमी को कई नामो से जाना जाता है. जैसे
अष्टमी रोहिणी
श्री जयंती
कृष्ण जयंती
रोहिणी अष्टमी
कृष्णाष्टमी
गोकुलाष्टमी

Krishna Janmashtami Puja Method and Mantra

जन्माष्टमी व्रत कथा…

पाप और शोक के दावानल को दग्ध करने हेतु, भारत की इस पावन धरा पर स्वयं भगवान विष्णु अपनी सोलह कलाओं के साथ भगवान श्रीकृष्ण के रूप में भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में अवतरित हुए। भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य उत्सव के रूप में ही हम इस पावन दिवस को महापर्व जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। पौराणिक कथानुसार जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ उस समय आकाश में घना अन्धकार छाया हुआ था, घनघोर वर्षा हो रही थी, उनके माता-पिता वसुदेव-देवकी बेड़ियों में बंधे थे, लेकिन प्रभु की कृपा से बेड़ियों के साथ-साथ कारागार के द्वार स्वयं ही खुल गए, पहरेदार गहरी नींद में सो गए और वसुदेव श्रीकृष्ण को उफनती यमुना के पार गोकुल में अपने मित्र नन्दगोप के घर ले गए और नन्द की पत्नी यशोदा के गर्भ से उत्पन्न कन्या को लेकर वापस कारागार आ गए।

भगवान श्री कृष्ण के जन्म दिवस को कृष्ण जन्माष्टमी के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। भगवान के जन्मदिवस को लोग खूब धूम धाम से मानते हैं और भगवान कृष्ण के लिए व्रत भी रखते हैं।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार मनाकर उनका व्रत रखने से हर मनोकामना पूरी की जा सकती है। लेकिन यदि आप वास्तव में भगवान से प्रेम करते हैं तो आप भगवान से ये मत माँगिएगा कि भगवान आप हमें ये वस्तु दें। भगवान से कहियेगा भगवान आपको मेरे लिए जो अच्छा लगे आप मुझे वो दें।
आपको जितना फल भगवान का व्रत रखने से मिलेगा उतना ही फल भगवान श्री कृष्ण के व्रत की कथा सुनने भी मिलेगा। भगवान के जन्म की कथा ही, उनके व्रत की कथा है

जन्माष्टमी व्रत कैसे करे…

वैसे तो इस व्रत को जैसे आपका परिवार करता आ रहा है, वैसे ही कर लीजिये। कोई विशेष नियम वगैरह की जरुरत नहीं है। यदि आप सोच रहे हैं बहुत ज्यादा नियम से आप व्रत करेंगे तो ही आपको फल मिलेगा या भगवान ज्यादा खुश होंगे तो ऐसा कुछ भी नहीं है। इस व्रत में आपका भाव कितना है, आपका भगवान से प्रेम कितना है, इस बात से भगवान खुश होंगे। आपको जैसे सहज हो, सुलभ हो, वैसे आप व्रत कीजिये।

व्रत के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएँ। उस दिन ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हैं

कुछ लोग इस दिन पूरे दिन का व्रत/उपवास रखते है और कृष्ण जन्म के पश्चात रात 12 बजे बाद भोजन गृहण करते है।
वैसे तो कुछ लोग इस दिन निराहार रहते हैं। कुछ लोग तो पानी तक भी नहीं पीते हैं पूरा दिन। कुछ लोग सिर्फ 1 बार पानी पीते हैं। कुछ लोग एक समय फलाहार लेते हैं। आप इनमें से जो भी कर पाओ वो करना चाहिए। कोई विशेष नियम नहीं है। एक भगवान का छोटा सा झूला रखो, उसमे बाल गोपाल को बिठाओ और झूला झुलाओ। झूला नहीं है तो आप मंदिर में शाम को जाओ, रात में जाओ और वहाँ पर भगवान को झूला झुलाओ। आप इस दिन खूब भगवान का नाम लो। भजन करो। उनको याद करो, भगवान का दर्शन करो। इसके बाद रात में 12 बजे भगवान की आरती करो, सभी को जन्मदिवस की बधाई दो।
नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की
हाथी दिने घोडा दिने और दिनी पालकी।

कृष्ण जन्माष्टमी पूजा कैसे करे…

श्री कृष्ण का जन्म वसुदेव तथा देवकी के घर रात्री 12 बजे हुआ था. इसलिए पूरे भारत मे कृष्ण जन्म को रात्री मे ही 12 बजे मनाया जाता है. हर साल भादव मास की अष्टमी के दिन रात्रि मे 12 बजे हर मंदिर तथा घरो मे प्रतीक के रूप मे लोग श्री कृष्ण का जन्म करते है. जन्म के बाद उनका दूध, दही तथा शुध्द जल से अभिषेक करते है, तथा माखन मिश्री, पंजरी तथा खीरा ककड़ी का भोग लगाते है. तत्पश्चात कृष्ण जी की आरती करते है, कुछ लोग खुशी मे रात भर भजन कीर्तन करते तथा नाचते गाते है.

कृष्ण जन्माष्टमी भोग कैसे बनाये…

श्री कृष्ण जी भोग स्वरूप माखन मिश्री, खीरा ककड़ी, पंचामृत तथा पंजरी का भोग लगाया जाता है. ध्यान रखिए श्री कृष्ण को लगाया हुआ भोग बिना तुलसी पत्र के स्वीकार नहीं होता है. इसलिए जब भी आप कृष्ण जी को भोग लगाए, उसमे तुलसी पत्र डालना ना भूले. श्री कृष्ण जी के भोग मे बने पंचामृत मे दूध, दही, शक्कर, घी तथा शहद मिला रहता है, तथा भोग लगते वक़्त इसमे तुलसी पत्र मिलाये जाते है.
श्री कृष्ण जी को जो पंजरी भोग मे लगाई जाती है वह भी साधारण पंजरी से अलग होती है. वैसे तो पंजरी आटे की बनती है, परंतु जो पंजरी कृष्ण जी को अर्पित करते है, उसे धनिये से बनाया जाता है. पंजरी बनाने के लिए पिसे हुये धनिये को थोड़ा सा घी डालकर सेका जाता है. और इसमे पिसी शक्कर मिलाई जाती है. लोग इसमे अपनी इच्छा अनुसार सूखे मेवे मिलाते है, कुछ लोग इसमे सोठ भी डालते है और फिर श्री कृष्ण को भोग लगाते है.

जन्माष्टमी पूजन के मंत्र…

  • योगेश्वराय योगसम्भवाय योगपताये गोविन्दाय नमो नमः
  • यज्ञेश्वराय यज्ञसम्भवाय यज्ञपतये गोविन्दाय नमो नमः
  • वीश्वाय विश्वेश्वराय विश्वसम्भवाय विश्वपतये गोविन्दाय नमो नमः
  • धर्मेश्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः

 

  1. (इस मंत्र द्वारा श्री हरि का ध्यान करें)
  2. (इस मंत्र द्वारा श्री कृष्ण की बाल प्रतिमा को स्नान कराएं)
  3. (इस मंत्र द्वारा भगवान को धूप ,दीप, पुष्प, फल आदि अर्पण करें)
  4. (इस मंत्र से नैवेद्य या प्रसाद अर्पित करें)

Krishna Janmashtami Puja Method and Mantra

जन्माष्टमी व्रत का फल…

भविष्यपुराण के अनुसार जन्माष्टमी व्रत के पुण्य से व्यक्ति पुत्र, संतान, अरोग्य, धन धान्य ,दीर्घायु, राज्य तथा मनोरथ को प्राप्त करता है। इसके अलावा माना जाता है कि जो एक बार भी इस व्रत को कर लेता है वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है यानि मोक्ष को प्राप्त करता है।
जन्माष्टमी का त्यौहार का एक मनोरंजक पक्ष दही-हांडी भी है। यह प्रकार का खेल है जिसमें बच्चे भगवान कृष्ण द्वारा माखन चुराने की लीला का मंचन करते हैं। महाराष्ट्र और इसके आसपास की जगहों पर यह प्रसिद्ध खेल है।

जय श्री कृष्णा जय श्री कुंजबिहारी श्री हरिदास जी।

वृंदावन में बाँकेबिहारी जी मंदिर में बिहारी जी की काले रंग की प्रतिमा है। इस प्रतिमा के विषय में मान्यता है कि इस प्रतिमा में साक्षात् श्रीकृष्ण और राधाजी समाहित हैं इसलिए इनके दर्शन मात्र से राधा-कृष्ण के दर्शन के फल की प्राप्ति होती है।

इस प्रतिमा के प्रकट होने की कथा और लीला बड़ी ही रोचक और अद्भुत है इसलिए प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास की पंचमी तिथि को बाँकेबिहारी मंदिर में बाँकेबिहारी प्रकटोत्सव मनाया जाता है।

बाँकेबिहारी जी के प्रकट होने की कथा-

संगीत सम्राट तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास जी भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। वृंदावन में स्थित श्रीकृष्ण की रास-स्थली निधिवन में बैठकर भगवान को अपने संगीत से रिझाया करते थे। भगवान की भक्ति में डूबकर हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और गायन से रीझकर भगवान श्रीकृष्ण इनके सामने आ गये। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्रीकृष्ण को दुलार करने लगे।

एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि, आप अकेले ही श्रीकृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी साँवरे सलोने का दर्शन करवाइये।

इसके बाद हरिदास जी श्रीकृष्ण की भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा-कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ गया और गाने लगे –

भाई री सहज जोरी प्रकट भई,
जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे।
प्रथम है हुती अब हूँ आगे हूँ रहि है न टरि है तैसे।
अंग-अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे।
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुँज बिहारी सम वैसे वैसे।

श्रीकृष्ण और राधाजी ने हरिदास के पास रहने की इच्छा प्रकट की।

हरिदास जी ने कृष्णजी से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूँ। आपको लंगोट पहना दूँगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहाँ से लाकर दूँगा।

भक्त की बात सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कराए और राधा-कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह के रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को ‘बाँकेबिहारी’ नाम दिया। बाँके बिहारी मंदिर में इसी विग्रह के दर्शन होते हैं। बाँके बिहारी के विग्रह में राधा-कृष्ण दोनों ही समाए हुए हैं, जो भी श्रीकृष्ण के इस विग्रह का दर्शन करता है, उसकी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।

 

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