10 बाल दिवस पर कविता 2022 Bal diwas par kavita

भारत में 14 नवम्‍बर को बाल दिवस मनाया जाता है क्‍योंकि इस दिन महान स्‍वतंत्रता सेनानी और स्‍वतंत्र भारत में पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्‍म हुआ था। चाचा नेहरू पर कविता

बच्‍चों के प्रति उनके प्रेम और नेहरूजी को श्रद्धांजलि के तौर पर उनके जन्मदिन को बाल-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

यहां पर हमने बाल दिवस पर बच्चों के लिए 10 कविताएं शेयर की है। उम्मीद करते हैं आपको यह हिंदी कविताएं पसंद आयेंगी। आपको यह कैसी लगी, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

1 ,बाल दिवस पर कविता

चलो मिलकर हम बनाएँ
अदभुत इक संसार,
बाल दिवस हम बच्चों का
है प्यारा त्योहार।

गले मिलें, हम खुशियाँ बाँटें
मन से द्वेष मिटाएँ,
आपस में भाईचारे का
अंतस भाव जगाएँ ।

अधर हमारे मुस्कान बिखेरें
रहे छलकता प्यार।

हम सब मन से हैं भोले
पर हैं नहीं नादान,
हमें देखकर फूल खिलते
बिखराते मुस्कान।

कभी किसी को दुख न पहुँचे
ऐसा हो व्यवहार।

चाचा नेहरू हम बच्चों का
करते थे सत्कार,
भले बने हम, सीधे-सच्चे
उनके थे बिचार।

धन्यवाद दें हम सब बच्चे
और माने उपकार।

बलदाऊ राम साहू

 

2, बाल दिवस पर कविता

बचपन के दिन कितने प्यारे थे
सोनू मोनू चिंटू मिंटू दोस्त हमारे थे ।
बचपन में सूरत कितनी भोली थी
तू तलाई हुई कितनी प्यारी बोली थी
नाना नानी दादा दादी के कितने प्यारे थे
घर में सब के राज दुलारे थे
याद आता है शरारत करके मां की आंचल में छुप जाना
फिर वकीली अंदाज में सजा से मां का हमें बचा जाना
वो माटी के घरोदे
कागज की नावें
याद करूं जब बचपन को
तो मन हर्षित हो जावे

 

3 , बाल दिवस पर देश के गरीब बच्चों का हालात बयान करती मेरी कविता प्रस्तुत है:-
कूड़ा

——–
मैंने उसे कूड़े में
रद्दी कागज़ के टुकड़ों को बीनते देखा
मैंने उसे कूड़े में
टिन के जंग लगे डिब्बे समेटते देखा
मैंने उसे कूड़े में
प्लास्टिक की बोतलें इकट्ठे करते देखा
मैंने उसे कूड़े में
बेकार पुराने खिलौनों को सहेजते देखा
मैंने उसे कूड़े में
फटे खराब कपड़ो को समेटते हुये देखा
मैंने उसे कूड़े में
लोहे के कबाड़ को जमा करते देखा
मैंने उसे कूड़े में
अपनी खुशियों को ढूंढते देखा
मैंने उसे कूड़े में
अपने बचपन को खोजते देखा

बाल कल्याण की ढेरों घोषित योजनाओं के बीच
पीठ पर बोरा लटकाये हुये
बचपन की नादान मुस्कुराती आखों के साथ
मैंने उसे कूड़े में
अपने वर्तमान को टटोलते देखा
मैंने उसे कूड़े में
अपने भविष्य को तलाशते देखा!

@सर्वाधिकार सुरक्षित
राजेश पराते

 

बाल दिवस के अवसर पर लिखी एक कविता

 4 ,बाल दिवस चलो मनाएँ

बाल दिवस हम चलो मनाएँ
हँसे, गाएँ और मुस्काएँ।

लाल गुलाब चलो ले आएँ
अचकन में हम उसे लगाएँ

ऊँच-नीच का भेद भुलाकर
छोटे – बड़े एक हो जाएँ।

नहीं कोई है अब पराया
सब अपने हैं गले लगाएँ।

आओ मिलकर एक स्वर से
वंदेमातरम् हम सब गाएँ ।

-बलदाऊ राम साहू

 

“बाल दिवस ” पर नेहरू जी की पावन स्मृति को समर्पित एक कविता

 5 , घोघो रानी कित्ता पानी

पानी से ऊपर बहुत ऊपर
तैरता था मन का उल्लास
जब खेलते थे हम बचपन में
घोघो रानी का खेल
टखने से घुटने तक
घुटने से गले तक
चढ़ता जाता था पानी
और डूबती जाती थी रानी

रानी दिलेर थी
लहरों के नीचे
परत दर परत ढ़ूढ़ती थी
आदिम इच्छाओं की अस्थियाँ
सूर्यास्त में रंगीन किरणें
जब तैरती थीं लहरों पर
रानी दूर तक डूबती थी डूब में
भूमिगत सूर्य को तलाशने

हम रोमांस से भर कर चिल्लाते थे
“घोघो रानी घोघो रानी
कित्ता पानी कित्ता पानी”
आकंठ पानी में डूबी रानी
उमगकर कहती थी हमसे
इत्ता पानी इत्ता पानी ——-
इत्ता पानी इत्ता पानी ——–

रानी के कंठ में
पानी का हहराता स्वर होता था
हमारे भीतर
उल्लास और हर्ष का सागर
हम लहरों पर दूर तक
अठखेलियाँ करते थे
जब खेलते थे बचपन में
घोघो रानी का खेल

आज बचपन के परिदृश्य में
कहीं नहीं है घोघो रानी
नहीं है कहीं
पानी के उछाल के साथ
मन के उल्लास का वह खेल
“घोघो रानी घोघो रानी
कित्ता पानी कित्ता पानी”

बच्चे बड़े हो गये हैं बचपन में
वे नहीं खेलते अब
कित्ता पानी- इत्ता पानी का खेल
कथा- कहानी घोघो रानी की बातें
नहीं भाती उन्हें
वे सीख रहे हैं
चौका छक्का लगाकर
समय को मात देना
माउस की बटन दबाकर
दुनिया मुट्ठी में करना
उनके मन का उल्लास
बंद कमरे के विलास में कैद है
उनके बचपन के खेल में
कहीं नहीं है
घोघो रानी कित्ता पानी का खेल

 

6 , बाल दिवस पर

दिवाली है बेटा आज छुट्टी कर लो
इस पुराने कपड़े को छोड़ नए पहन लो
अच्छा ये बताओ माँ पकवान बना रही है
जाओ खाओ एक दिन भी मस्ती कर लो

देखो मेरे बच्चे नए कपड़े पहन पटाखे छोड़ते है
अच्छे अच्छे पकवान और मस्ती में जीते है
लेकिन तुम 14 साल के उम्र में भी काम करते हो
शिक्षा -आहार का अधिकार है तब भी खटते हो

तुम्हे देख तो ये लग रहा सब सरकारी खानपुर्ती है
या हम अमीरो का तुम्हे सताने का गुण्डागर्दी है
तुम्हारे पेट देख लगता है कि कई दिनो से खाए नही हो
कोरोना काल में मजदूरी शायद पाए नही हो

ये सुन बच्चा रो-कर कहने लगा
खाने को मिलते नही शिक्षा कौन देगा
अरे सर बाबूजी को खटते-खटते टी बी हो गया
पाँच भाई-बहन है मुझे भी मेहनत करना मजबुरी हो गया

माँ दुसरे-दुसरे घरों में काम करती है
एक के कमाने से आजकल कहाँ पेट भरती है
मै तो पढ़ न सका भाई बहनो को पढा रहा हूँ
बड़ा बेटा हूँ घर का जिम्मेदारी निभा रहा हूँ

सर क्या चुनाव नजदीक आ गया है
कोई नही पूछता गरीबो को क्या आप नेता है
या कोई कवि हो जो मुझपर लिख कर नाम कमाना चाहते हो
दर्द वैसे ही बहुत है और दर्द क्यो देना चाहते हो

मैने उसे 500 रुपए देना चाहा
देख वह बोला क्या 5000 का काम कराना है
अगर निस्वार्थ दे ही रहे हो रंजीत-कितना दिन तक ये चलेगा
देना ही है रोजगार दो कोई बेरोजगार न रहे न भुखे सोएगा

 

7 शीर्षक : बाल दिवस
विधा : कविता

बाल दिवस मनाते हैं इस दिन, 14 नवंबर का दिन है आज,
आज के दिन बच्चों में होता, एक अलग ही अंदाज़ ।
स्कूलों में होते खेल कूद, बच्चे रहते दिनभर व्यस्त,
छुट्टी का रहता माहौल, नाचते गाते होकर मदमस्त ।

देखता हुँ जब गरीब बच्चों को, बीनते रहते सडक से कचड़ा,
बाल दिवस के इस दिन, कोई न समझता इनका दुखड़ा ।
नसीब न होती दो जून की रोटी, कैसे मनायें बालदिवस ?
बच्चों के नाम है एक औपचारिकता, कैसा है यह बालदिवस ?

मुफ्त भोजन के नाम पर, स्कूलों में होता भ्रष्टाचार,
सुविधायें तो बस नाम की, मिलता नहीं सही आहार ।
बाल मजदूरी के विरोध में, होता यूँही सरकारी प्रचार,
काम करते कारखानों में, जीवन में घोर अंधकार ।

छोटी छोटी बच्चियों से, होते खुलेआम बलात्कार,
कैसे मनाएं बालदिवस, जब होता बच्चों का ही व्यापार ।
कपडे भी नहीं पुरे तन पर, हो रहे सब तार तार,
अभिशाप बन गया बचपन इनका, मानवता का हुआ संहार ।

कैसे मनाएं बालदिवस, जिन बच्चों के पास नहीं बचपन,
कंधों पर अपनों की जिम्मेदारी, खो गया इनका बचपन ।
स्कूलों तक सीमित हो गया, बालदिवस का यह दिन,
कैसे मनाएं बालदिवस ये बच्चे, जो कचरा बीनते प्रतिदिन ।

कैसी है यह विडम्बना, कैसा यह विरोधाभास ?
कैसे मनाएं बालदिवस, जब नहीं भविष्य की आश ।
गरीबी का अजगर मुंह फैलाये, कर गया बचपन को ग्रास,
कैसे मनाएं ये बालदिवस, जब तन मन है हताश ?

 

सी ए रतन कुमार अगरवाला

 

8 “बाल दिवस” की हार्दिक शुभकामनायें।
इस अवसर पर बच्चों के लिए मेरे द्वारा रचित एक कविता “सर्दी आई”👇

सर्दी आई, सर्दी आई देखो ये सर्दी आई

बर्फीली ठण्डी हवा है चलती
धरती हिम चादर सी लगती
अलसाई नदी मचल कर बहती
धूप बगीचों का रूप निखारती

रजाई-कंबल, मुस्कान लिए सिगड़ी लाई
सर्दी आई, सर्दी आई देखो ये सर्दी आई

पंक्षी चहकते डाली डाली
गाय-बैल करते मस्त जुगाली
भैंसे फिर भी जल में तैर रही हैं
शाम को बाजारों में भीड़ नहीं है

हद ! ये ठिठुरन, हद ! ये ठंडी रातें आई
सर्दी आई, सर्दी आई देखो ये सर्दी आई

लाल टमाटर और बेर पीले पीले
कई सब्जियां हैं सर्दी में फल रसीले
अच्छी लगती अब तो धूप सुनहरी
सुबह-शाम ओंस पौधों को नहलाती

हर तरफ चाय दुकानों में रंगत आई
सर्दी आई, सर्दी आई देखो ये सर्दी आई

सूरज मौन, धूप शर्माती, दिन हुए छोटे-छोटे
घास-फूंस हैं ओंस की चादर ओढ़े-ओढ़े
भेड़-बकरियां खाती पत्ती कोमल-कोमल
सुबह-शाम कंपकपी और सिरहन

जगह-जगह अलाव, अल्हड़ ॠतु आई
सर्दी आई, सर्दी आई देखो ये सर्दी आई

☆ राजेश कटरे

9 बाल दिवस पर बाल कविता
********

पापा! पापा! बाल दिवस है
मुझे दिला दो ट्वॉय।
खेलूँगा जी भरकर उससे
घोड़ा हो या गाय।।

आज नहीं पढ़ने को कहना
पूरे दिन खेलूँगा।
बस्ता मैंने पैक कर दिया
आज नहीं खोलूँगा।।

मम्मा से कह देना मुझसे
आज नहीं कुछ बोलें।
मैं दीदी सँग खेलूँगा
वो अपना टी वी खोलें।।

होमवर्क कल ही कर डाला
आज नहीं है टेंशन।
आज हमारी आज़ादी है
आज न कोई बन्धन।।

पापा! मम्मा! आज आप भी
बन जाओ ना बच्चे।
अक़्लमंद से फिर बन जाओ
थोड़े अकल के कच्चे।।

खूब मज़ा आएगा फिर तो
साथ-साथ खेलेंगे।
बाल दिवस पर सारे बच्चे
खूब मज़े ले लेंगे।।

-गौरव वाजपेयी “स्वप्निल”

 

10 बाल दिवस पर अजन्मी बालिका की पुकार

ओ मां!
सुन ली मैंने सारी बात,
करने वाले हो मुझ पर घात।
मत रोको मुझे आने दो,
सुंदर स्वप्न सजाने दो।
मुझको बस अवसर दे देना,
मन लगाकर खूब पढ़ूंगी।
नहीं बनूंगी तुम पर बोझ,
नाम तुम्हारा रोशन करूंगी।
जो रख लोगी मुझको आज,
इक दिन होगा मुझ पर नाज़।
मैं तुम्हारी बिटिया प्यारी,
पापा की मैं राजदुलारी।
जब कोई संकट आएगा,
दुर्गा का मैं रूप धरूंगी।
मुझको संसार में आने दो,
अपना आंगन सजाने दो।
तुमको ना निराश करूंगी,
खुशियों से झोली भर दूंगी।

आशिमा वार्ष्णेय’राज’

 

 

 

 

 

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